बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Temple History In Hindi)

नमस्कार दोस्तो स्वागत है आप सभी का मेरे एक और लेख में जिसमें मैं आज आपको बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Temple History In Hindi) के बारे में बताऊंगा। यह मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में चमोली जिले में बसा है। यह मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे पर नर और नारायण नामक पर्वतों के मध्य में स्थित है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू धार्मिक स्थल है। इसे धरती का बैकुंठ धाम भी कहा जाता है। यह मंदिर उत्तराखण्ड में स्थित चार धामों में से प्रमुख धाम है।

बद्रीनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व  

बद्रीनाथ मंदिर के बारे में धार्मिक ग्रंथ भागवत पुराण में कहा गया है, कि एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु जी के दर्शन के लिए क्षीर सागर में गए थे। तो उन्होने माता लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु जी पैर दबाते हुये देखा। यह सब देख कर आश्चर्य चकित देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से लक्ष्मी जी द्वारा पैर दबाने का कारण पूछा, तो अपने से हुये अपराध का पश्‍चाताप करने के लिए भगवान विष्णु तपस्या करने के लिए हिमालय की ओर चल दिये। जब भगवान विष्णु अपनी तपस्या में लीन थे, उसी समय वहाँ बहुत अधिक मात्रा में बर्फ गिरने लगी, और भगवान विष्णु पूरी तरह से बर्फ में डूब चुके थे। भगवान विष्णु जी की यह दशा देख माता लक्ष्मी जी का ह्रदय बहुत व्याकुल हो उठा। उन्होने स्वंय भगवान विष्णु जी के पास खड़े होकर एक बद्री (बेर) के व्रक्ष का रूप ले लिया और समस्त बर्फ को अपने ऊपर ले लिया। माता लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और बर्फ से बचाने के लिए कठोर तपस्या में लीन हो गयी।


कई वर्षों की तपस्या पूरी करने के बाद जब भगवान विष्णु जी ने आखें खोली तो देखा माता लक्ष्मी जी भी पूरी तरह से बर्फ से ढकी हुयी है। भगवान विष्णु जी ने माता लक्ष्मी जी की तपस्या को देख कर कहा हे देवी हम दोनों ने बराबर तपस्या की है, इसलिए इस धाम पर मुझे तुम्हारे साथ ही पुजा जाएगा, और तुमने मेरी रक्षा बद्री (बेर) के व्रक्ष के रूप में की है। इसलिए मुझे आज से बद्री के नाथ बद्रीनाथ के नाम से भी जाना जाएगा।

Badrinath Temple, बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ मंदिर मंदिर का इतिहास  

बद्रीनाथ मंदिर को अनादिकाल से स्थापित मंदिर माना जाता है। इस मंदिर की पुर्नस्थापना जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने 7 वीं शताब्दी में करवायी थी। बाद में रामानुज संप्रदाय के स्वामी वर्धराज की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश ने 16 वीं शताब्दी में इस मंदिर का विस्तार किया था। जब गढ़वाल मण्डल का विभाजन हुआ और इस देश में अंग्रेजों का शासन आया तो बद्रीनाथ मंदिर भी ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया, लेकिन गढ़वाल के राजा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष के रूप में बने रहे। मंदिर के मुख्य पुजारी का चयन गढ़वाल और दक्षिण भारत के शाही परिवारों के आपसी परामर्श के बाद होता है।

कई बार प्रकर्तिक आपदाओं से इस मंदिर परिसर को बहुत क्षति हुयी। लेकिन सन 1803 ईस्वी में हिमालय क्षेत्र आए भूकंप से इस मंदिर परिसर को बहुत नुकसान हुआ। बाद में जयपुर के राजा द्वारा इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था।

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बद्रीनाथ मंदिर की वास्तुकला  

बद्रीनाथ मंदिर के गर्भ गृह में भगवान बद्रीनारायण की शालिग्राम (काले पत्थर) से बनी मूर्ति विराजमान है।  यहाँ पर धन के देवता कुबेर, देवर्षि नारद, नर और नारायण की मूर्तियाँ भी विराजमान हैं। इन मूर्तियों के अतिरिक्त मंदिर में पन्द्रह और मूर्तियाँ हैं जिनमे माता लक्ष्मी (विष्णु की पत्नी), गरुड़ (नारायण का वाहन), और नवदुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों में दर्शाया गया है। मंदिर के ठीक नीचे गर्म पानी के झरनों का एक समूह है। जिसे तप्त कुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड को औषधीय माना जाता है। कई तीर्थयात्री इस मंदिर जाने से पहले इन झरनों में स्नान करने को अधिक पवित्र मानते हैं। इस झरनों का तापमान पूरे साल भर 55 डिग्री सेल्सियस ही रहता है। जबकि बाहर यहाँ के मोसम का तापमान पर पूरे साल 17 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है। मंदिर परिसर में दो पानी के तालाब हैं, जिन्हे नारद  कुण्ड और सूरी कुण्ड के नाम से जाना जाता है।

Badrinath Temple, बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ मंदिर की भौगोलिक स्थिति  

बद्रीनाथ मंदिर की ऊंचाई समुद्र से 3133 मीटर है। इस मंदिर के तीन मुख्य भागों (गर्भ गृह, पुजा हॉल और सभा मंडप) में विभाजित  हैं। मंदिर में गर्भ गृह के ऊपर शंकु आकार की छत है। जिस पर एक सोने का गुंबद बना हुआ है। इस मंदिर के आगे का हिस्सा बड़े-बड़े पत्थरों से बना है। इस मंदिर में धनुष आकार की खिड़कियाँ बनी है। मुख्य मंदिर में पहुँचने के लिए चौड़ी सीढ़ियाँ बनी हुयी हैं।

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बद्रीनाथ मंदिर खुलने का समय 

बद्रीनाथ मंदिर प्रत्येक दिन सुबह 4:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है।

खराब मौसम के कारण यह मंदिर साल में सिर्फ 6 महीने के लिए खुला रहता है।

यह मंदिर मई में अक्षय तृतीया के दिन मंदिर खुलता है। यह नवंबर में विजयादशमी की पूर्व संध्या को बंद हो जाता है।

बद्रीनाथ मंदिर में दर्शन और पूजा का समय है-

प्रातः 4:30 बजे से दोपहर 1:०० बजे तक (सुबह दर्शन)।

शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक (शाम दर्शन)।

अभिषेकम सुबह 7:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक।

शायना आरती रात 10:30 बजे से 11:00 बजे तक वेद पाठगीता पाठअखंड ज्योति के साथ खत्म होती है।

बद्रीनाथ मंदिर आस-पास के दर्शनीय स्थल  

बद्रीनाथ मंदिर के आस पास की कुछ प्रमुख जगहों के बारे में नीचे जानकारी दी गयी है।

1- चरणपादुका

चरणपादुका नर नारायण पर्वत पर स्थित है। जो बद्रीनाथ मंदिर से सिर्फ 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान विष्णु ने धरती पर सबसे पहली बार  पैर रखा था, यह चरणपादुका भगवान विष्णु के उन्ही पैरों के निशान हैं। इस शिलाखंड को एक धार्मिक स्थल के रूप में माना जाता है, जहां हर साल सैकड़ों तीर्थयात्री और पर्यटक आते हैं।

2- तप्त कुंड

तप्त कुंड बद्रीनाथ मंदिर के पास एक प्राकृतिक गर्म पानी का झरना है। जहां पर पनि का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होता है। माना जाता है कि इस कुंड के पानी में औषधीय गुण होते हैं, जिससे विभिन्न त्वचा रोगों का इलाज होता है। बद्रीनाथ मंदिर जाने से पहले भक्त तप्त कुंड में डुबकी लगाते हैं। यह कुंड आत्मा को शुद्ध करने के लिए भी जाना जाता है। तीर्थयात्री इस कुंड में अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए आते हैं।

3- पांडुकेश्वर

पांडुकेश्वर हिंदुओं के लिए एक पवित्र धार्मिक स्थल है। यह मंदिर 6000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यहीं पर पांडवों ने भगवान शिव की पूजा की थी, और इस मंदिर को पांडवों द्वारा बनाया गया था। इस स्थान की मनमोहक प्राकृतिक सुंदरता दूर-दूर से प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करती है।

4-शेषनेत्र

शेषनेत्र धार्मिक कारणों से प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने यहां अनंत शेषनाग पर वापसी की थी। यहाँ पर अनंत शेषनाग की आंख की शिलाखंड पर वास्तविक छाप है। मान्यता है कि शेषनेत्र ही भगवान बद्रीनाथ के मंदिर की रक्षा करता है। इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

5- नीलकंठ पर्वत

नीलकंठ पर्वत उत्तराखंड में स्थित हिमालय के गढ़वाल मंडल की एक प्रमुख चोटी है। यह पर्वत साल में अधिक समय बर्फ से ढका रहता है। यह बद्रीनाथ मंदिर के पास होने के कारण यह क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण और धार्मिक रूप से प्रतिष्ठित चोटियों में से एक है। यहाँ पर अलकनंदा नदी की प्यारी घाटी को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

Badrinath Temple, बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ मंदिर कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से बद्रीनाथ मंदिर में पहुँचने के लिये जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से टैक्सी के माध्यम से पहुँच सकते हैं। हवाई अड्डे से मंदिर की दूरी लगभग 307 किलोमीटर है।

रेल मार्ग से बद्रीनाथ मंदिर में पहुँचने के लिये ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से टैक्सी से मंदिर परिसर तक पहुँच सकते हो। रेल मार्ग से मंदिर की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है।

रोड मार्ग से बद्रीनाथ मंदिर में पहुँचने के लिये उत्तराखण्ड राज्य के देहारादून शहर से परिवहन निगम की बसों,निजी बसों और टैक्सियों के माध्यम से मंदिर परिसर में पहुँच सकते हैं। 

बद्रीनाथ मंदिर के पास होटल  

बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित होटलों के बारे में जानकारी नीचे दी गयी है। यह सभी होटल मंदिर के पास ही स्थित है। आप अपनी सुविधानुसार नीचे दिये गए किसी भी होटल में रुक सकते हैं-

1-Hotel Narayan Palace.

2-Hotel Narayan N Invitation.

3-Sarovar Portico Badrinath - A Sarovar Hotel.

4-Hotel Dwarikesh.

5-Hotel Patliputra.

6-Hotel Ganga Ashoka Rishikesh.

7-Hotel Indira Nikunj.

8-Hotel Yog Vashishth.

9-Hotel Great Ganga.

10-Hotel Vasundhara Palace.

Conclusion

आशा करता हूँ कि मैंने जो बद्रीनाथ मंदिर के बारे में आपको जानकारी दी वह आपको अच्छे से समझ आ गयी होगी। मैंने इस पोस्ट के माध्यम से बद्रीनाथ मंदिर से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने का प्रयास किया है।

अगर आप किसी मंदिर के बारे में जानना चाहते हो तो हमें कमेंट करके बताएं। जो भी लोग आपके आस पास में या आपके दोस्तो में मंदिरों के बारे में जानना चाहते हैं, आप उनको हमारा पोस्ट शेअर कर सकते है। हमारी पोस्ट को अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद।

Note

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